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“सत्य बनाम झूठ: RTI का उपयोग और पुलिस विवाद का पूरा सच”

जो एक जाने-माने आरटीआई एक्टिविस्ट बाड़मेर में हैं, अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए पुलिस की कार्यशैली और झूठे दस्तावेजों को उजागर करने के लिए एक मिसाल पेश की है। यह मामला भगवानसिंह लाबराऊ और पुलिस के बीच न्याय और सच्चाई की लड़ाई का है, जो प्रशासनिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और सत्य की जीत का प्रतीक बन चुका है।

विवाद की शुरुआत और पुलिस की पहली कार्यवाही

पुलिस ने भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ धारा 107 और 116(3) सीआरपीसी के तहत कोर्ट में झूठे और फर्जी तथ्यों पर आधारित इस्तगासा पेश किया। उन्होंने कोर्ट में यह दावा किया कि जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय, बाड़मेर से उन्हें भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश प्राप्त हुआ है।

प्रमुख दावा:

पुलिस ने न्यायालय में पत्र क्रमांक 638 दिनांक 14.06.2024 प्रस्तुत किया, जिसमें भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ कार्यवाही का आदेश दिया गया था।

पुलिस ने इसे अपनी कार्रवाई के समर्थन में मुख्य साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।

भगवानसिंह लाबराऊ की पहली प्रतिक्रिया: आरटीआई दायर करना

भगवानसिंह लाबराऊ, जो आरटीआई के माध्यम से प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता के लिए सक्रिय रूप से काम करते हैं, ने इस मामले में पहला कदम उठाया। उन्होंने पुलिस थाना रामसर से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत यह जानकारी मांगी कि:

जिला पुलिस अधीक्षक, बाड़मेर ने भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ कार्यवाही के लिए थानाधिकारी रामसर को आदेश दिया है या नहीं।

यदि आदेश दिया गया है, तो उसकी प्रमाणिक प्रति उपलब्ध कराई जाए।

पुलिस का जवाब:

पुलिस ने आरटीआई के जवाब में स्पष्ट रूप से इंकार किया कि ऐसा कोई आदेश मौजूद है।

पुलिस थाना रामसर ने कहा कि जिला पुलिस अधीक्षक ने भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कोई आदेश जारी नहीं किया।

पुलिस की फर्जी कार्रवाई का खुलासा

आरटीआई के इस जवाब से यह साफ हो गया कि पुलिस ने न्यायालय में झूठे तथ्यों के आधार पर पत्र क्रमांक 638 दिनांक 14.06.2024 को प्रस्तुत किया था।
यह खुलासा:

पुलिस ने भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ कार्यवाही को न्यायोचित ठहराने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए।

न्यायालय को गुमराह करने और भगवानसिंह लाबराऊ को झूठे आरोपों में फंसाने का प्रयास किया गया।

भगवानसिंह लाबराऊ की अगली कार्रवाई: कोर्ट में प्रार्थना-पत्र दाखिल करना

भगवानसिंह लाबराऊ ने इस पूरे मामले की गंभीरता को समझते हुए न्यायालय में धारा 379 सहपठित धारा 215 बीएनएसएस के तहत प्रार्थना-पत्र दाखिल किया।

प्रार्थना-पत्र के मुख्य बिंदु:

1-पुलिस द्वारा न्यायालय में फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने की जांच की जाए।

2-पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उचित कानूनी कार्यवाही की जाए।

3-सत्य और झूठ का पर्दाफाश करते हुए न्यायालय से भगवानसिंह लाबराऊ के पक्ष में न्याय की मांग।

पुलिस का बचाव और भगवानसिंह लाबराऊ की पुन: आरटीआई

जब पुलिस ने कोर्ट में अपनी कार्यवाही को सही साबित करने के लिए एएसपी जस्साराम बॉस के आदेश का हवाला दिया, तो भगवानसिंह लाबराऊ ने इस दावे को चुनौती दी।

पुलिस का बचाव:

पुलिस ने कोर्ट में तर्क दिया कि एएसपी जस्साराम बॉस, जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय, ने भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश दिया था।

उन्होंने इसे एक बार फिर अपनी कार्यवाही को सही ठहराने के लिए मुख्य आधार बनाया।

भगवानसिंह लाबराऊ की प्रतिक्रिया:

उन्होंने पुन: आरटीआई दायर की और पुलिस के इस दावे की सच्चाई जाननी चाही।

उन्होंने जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय से यह पूछा कि क्या एएसपी जस्साराम बॉस ने ऐसा कोई आदेश जारी किया है।

आरटीआई का जवाब:

जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय, बाड़मेर, ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है।

पुलिस का बचाव झूठा साबित हुआ।

भगवानसिंह लाबराऊ के प्रयास और सत्य की जीत इस पूरे प्रकरण में भगवानसिंह लाबराऊ ने दिखाया कि:

  1. कैसे आरटीआई का सही उपयोग प्रशासनिक पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है।
  2. झूठे दस्तावेजों और गुमराह करने वाली कार्यवाहियों को उजागर करने के लिए जागरूकता कितनी जरूरी है।
  3. सत्य और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता ही किसी भी अन्याय के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।

प्रमुख घटनाओं का सारांश:

  1. 26 जून 2024: पुलिस ने न्यायालय में फर्जी दस्तावेज पेश करते हुए भगवानसिंह लाबराऊ के खिलाफ कार्यवाही शुरू की।
  2. 29 जून 2024: भगवानसिंह लाबराऊ ने आरटीआई के माध्यम से इस मामले की जानकारी मांगी।
  3. 20 जुलाई 2024: आरटीआई के जवाब में पुलिस थाना रामसर ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ।
  4. 14 अगस्त 2024: भगवानसिंह लाबराऊ ने कोर्ट में पुलिस के खिलाफ प्रार्थना-पत्र दायर किया।
  5. 17 सितंबर 2024: पुलिस ने एएसपी जस्साराम बॉस के आदेश का दावा किया, जिसे भगवानसिंह लाबराऊ ने पुन: आरटीआई से जानकारी मांगी
  6. 18 नवम्बर 2024: जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय ने अंतिम आरटीआई के जवाब में पुलिस के सभी दावों को फर्जी और झूठा करार दिया।

संदेश और प्रेरणा

यह संघर्ष सभी नागरिकों के लिए एक प्रेरणा है। यह प्रकरण साबित करता है कि:

झूठ और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए कानून और अधिकारों का ज्ञान होना जरूरी है।

सूचना का अधिकार (RTI) एक सशक्त उपकरण है, जिसका सही उपयोग किसी भी गड़बड़ी और भ्रष्टाचार को उजागर कर सकता है।

“दिया और तूफान की लड़ाई में, हमेशा दिया ही जलता है। झूठ को कितनी भी हवा दो, सत्य की रोशनी उसे मिटा देती है।”

यह संघर्ष एक मिसाल है कि जब नागरिक अपने अधिकारों और सत्य के लिए खड़े होते हैं, तो झूठ और अन्याय को हराना संभव है।

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