भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया है कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाया गया संबंध उसे अपराध नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने सारे सबूत देखने के बाद पाया कि दोनों के बीच सहमति से ही संबंध बने थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद कहा कि एक दूसरे के साथ सहमति से रिश्ते में रहे किसी कपल का आपस में रिश्ता टूटने के आधार पर ही आपराधिक कार्रवाई चालू नहीं की जा सकती।
सहमति से बने जोड़े के बीच रिश्ता टूटने पर आपराधिक कार्यवाही नहीं हो सकती : सुप्रीम कोर्ट
मुख्य बिंदु:
1. **सहमति से बने रिश्ते का कानूनी पक्ष**
– सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सहमति से बने रिश्ते के विवाह में तब्दील न होने पर इसे आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।
– सहमति से बने संबंध टूटने पर आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं हो सकती।
2. **सुप्रीम कोर्ट का निर्णय**
– जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने आरोपी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला खारिज कर दिया।
3. **मामले का विवरण**
– शिकायतकर्ता ने सितंबर 2019 में FIR दर्ज कराई, जिसमें शादी का झूठा वादा कर यौन शोषण और धमकी देने का आरोप लगाया गया।
– आरोपी ने आईपीसी की धारा 376(2)(एन) और 506 के तहत दर्ज FIR रद्द करने के लिए याचिका दाखिल की।
4. **दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला**
– हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, यह मानते हुए कि मामले को आगे बढ़ाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत हैं।
5. **सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी**
– प्रारंभिक चरण में सहमति से बने रिश्ते को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता,जब तक कि वह वैवाहिक रिश्ते में न बदले।
Case Titile – प्रशांत बनाम दिल्ली राज्य

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को फैसला सुनाया कि रिश्ते के टूटने पर किसी एक पक्ष की शिकायत के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का औचित्य नहीं हो सकता।
अपनी प्रेमिका द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर पर आपराधिक कार्यवाही का सामना कर रहे एक व्यक्ति को राहत देते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि सहमति से बने रिश्ते में खटास आना ही आपराधिक कार्यवाही का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए। पीठ ने कहा, “शुरुआती चरणों में सहमति से बने रिश्ते को आपराधिकता का रंग नहीं दिया जा सकता, जब (यह) उक्त रिश्ता वैवाहिक रिश्ते में परिणत न हो।” पीठ ने कहा कि आरोपी और शिकायतकर्ता, दोनों दिल्ली के निवासी हैं, दो साल से रिश्ते में थे और वे एक-दूसरे के घर आते-जाते थे। पीठ ने कहा, “यह अकल्पनीय है कि शिकायतकर्ता अपनी ओर से स्वैच्छिक सहमति के अभाव में अपीलकर्ता से मिलना जारी रखेगी या उसके साथ लंबे समय तक संबंध बनाए रखेगी या शारीरिक संबंध बनाए रखेगी। इसके अलावा, अपीलकर्ता के लिए शिकायतकर्ता के आवासीय पते का पता लगाना असंभव होगा, जैसा कि एफआईआर में उल्लेख किया गया है, जब तक कि ऐसी जानकारी शिकायतकर्ता द्वारा स्वेच्छा से प्रदान नहीं की गई हो। यह भी पता चला है कि एक समय पर, दोनों पक्षों का एक-दूसरे से शादी करने का इरादा था, हालांकि यह योजना अंततः साकार नहीं हुई। अपीलकर्ता और शिकायतकर्ता सहमति से रिश्ते में थे। वे दोनों शिक्षित वयस्क हैं।”
Attachment सुप्रीम कोर्ट के फैसला
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