पुलिस एक्ट 2007 आओ जाने क्या है ये राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 62 से 69 के तहत हर जिले में एक पुलिस जवाबदेही समिति का गठन अनिवार्य किया गया है. इस समिति में चार सदस्य नागरिकों की तरफ से होंगे और पांचवें सदस्य-सचिव के रूप में जिले के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक होंगे. समिति के अध्यक्ष नागरिक सदस्यों में से होंगे.
1.पुलिस जबाबदेही समिति
राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 62 से 69 के तहत हर जिले में एक पुलिस जवाबदेही समिति का गठन अनिवार्य किया गया है. इस समिति में चार सदस्य नागरिकों की तरफ से होंगे और पांचवें सदस्य-सचिव के रूप में जिले के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक होंगे. समिति के अध्यक्ष नागरिक सदस्यों में से होंगे.
इस समिति की जिम्मेदारी है कि वह उप निरीक्षक स्तर तक के पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा आमजन के साथ किये गए दुर्व्यवहार या ज्यादती के मामलों की शिकायत सुनेगी. इस समिति को मजिस्ट्रेट की तरह सम्मन करने के अधिकार दिए गए हैं. समिति अगर संतुष्ट हो गई कि दुर्व्यवहार का मामला हुआ है तो यह पुलिस अधीक्षक को आदेश देगी कि वह दोषी पुलिसकर्मी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करे और तीन महीने के भीतर यह काम हो. यह सलाह नहीं, आदेश होगा.
समिति बनाने का उद्धेश्य यह था कि पुलिस सीधे जनता के प्रति जवाबदेह बने. अभी तक पुलिस के खिलाफ शिकायत पुलिस अधिकारियों या राजनेताओं को की जाती थी और उसमें सब गोलमाल हो जाता था. इसलिए ज्यादती होने पर भी आमजन मन मसोसकर रह जाता था. अब यह समिति एक सरल मगर प्रभावी मंच के रूप में काम करेगी.
परन्तु जागरूकता के अभाव में दस वर्षो से भी ज्यादा समय गुजरने के बावजूद लोगों को इस समिति के बारे में पता नहीं है. अधिकतर जिलों में ये समितियां 2015-17 में जागरूक साथियो द्वारा निगरानी कर बनाये गए दबाव से गठित भी हुई पर इनका प्रचार प्रसार नहीं के बराबर है. सदस्य भी नियम विरुद्ध राजनीति के क्षेत्र से बनाये गए हैं. ऊपर से उनको भी नहीं मालूम कि उनका समिति में क्या काम है. वे अपनी जिम्मेदारी और शक्ति से बेखबर हैं और सदस्य बनने से ही खुश हैं.
हमें सूचना के अधिकार से इन समितियों को सक्रिय करना है, दुरस्त करना है ताकि राजस्थान की पुलिस अब राजनेताओं की बजाय सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होना सीखे, जो पुलिस अधिनियम 2007 का मूल मकसद है.
आप हर महीने यह सूचना लेते रहो, ताकि पुलिस सजग रहे और समिति का काम सुचारू रूप से शुरू हो सके.
पुलिस ACT 2007 में CLG
नए पुलिस अधिनयम, 2007 की धारा 55 में यह कहा गया है कि अपराधों की रोकथाम में अब जनता पुलिस को सक्रियता से सहयोग करे. इसके लिए प्रत्येक पुलिस थाने और प्रत्येक पंचायत में ऐसे समूह (सामुदायिक सम्पर्क समूह या CLG ) गठित किये जाने का प्रावधान है. इन समूहों की बैठक नियमित होनी चाहिए और इनका एक संयोजक नागरिकों में से होना चाहिए. वही संयोजक इस बैठक की अध्यक्षता करेगा. पुलिस थाने के प्रभारी, इस समूह के सचिव के रूप में कार्य करेंगे. एक तरह से अब पुलिस को सीधे सीधे स्थानीय जनता के प्रति जवाबदेह होने और उससे तालमेल रखकर चलने को कह दिया गया है. संयोजक को विशेष जिम्मेदारी दी गई है कि वह नियमित रूप से थाने में आकर व्यवस्थाओं पर प्रभारी के साथ सक्रिय संवाद करे.
CLG से अपेक्षा यह रहती है कि वह अपराधों की रोकथाम में पुलिस को सूचनाएं और सहयोग दे. साथ ही कई अन्य काम भी समाज और पुलिस में बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए इस समूह को करने हैं.
पर असल में इन समितियों का कचरा कर दिया गया है. लोग इसी में खुश हैं कि वे थाने में जाकर कुर्सियों पर बैठते हैं और गप्पें मार लेते हैं ! अधिकतर जगह पर संयोजक नहीं बनाये गए हैं तो दूसरी ओर इन समूहों में राजनैतिक पदों पर आसीन लोगों को नियम विरुद्ध स्थापित कर दिया गया है. अब यह समूह एक क्लब जैसा हो गया है, जहाँ ईद-दीपवाली या अन्य मौकों पर शान्ति स्थापित करने के लिए लोगों को इकठ्ठा किया जाने लगा है. इन्हें शान्ति समितियों की जगह काम में लिया जाकर मूल उद्धेश्य से बहुत दूर कर दिया गया है. संयोजक की बजाय थाना प्रभारी या उनके उच्च अधिकारी ही अध्यक्षता करते दिखाई देते हैं.
जागरूकता के अभाव में यही होगा. हमें अब इस व्यवस्था को नियम के अनुसार चलवाकर नए पुलिस अधिनियम के मूल उद्धेश्य की पूर्ति करवानी होगी.सूचना के अधिकार से हम जब उचित सवाल पूछेंगे तो अधिकारी भी कितने दिन तक दिखाई देती मक्खी को निगलने को कहेंगे ?
बहुत हो गया कि लोग थाने के नाम से डरते रहे हैं. अब पुलिस किसी अंग्रेज या राजा की नहीं है, हमारी अपनी है तो उससे डर कैसा ? और जब हम पुलिस का वेतन देते हैं तो उसे हमारे प्रति सीधे जवाबदेह होना चाहिए. हाँ. हम जिम्मेदार नागरिकों की तरह नियमों का पालन करें, क़ानून का सम्मान करें.
महावीर पारीक,
सीईओ & फॉउंडर ,
लीगल अम्बिट >>>>>>>>>
