(CIC, High Court एवं Supreme Court के आवेदक-पक्षीय न्यायिक निर्देशों के आलोक में) सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 किसी अधिकारी की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि नागरिक की शक्ति के लिए बनाया गया कानून है। इसके बावजूद आज भी लोक सूचना अधिकारी सूचना को रोकना, टालना या भ्रामक उत्तर देना अपना विशेषाधिकार समझ बैठे हैं।
परंतु न्यायपालिका का रुख इस विषय में लगातार और स्पष्ट रहा है—जहाँ सूचना रोकी जाती है, वहाँ कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है।
Supreme Court : नागरिक का जानने का अधिकार सर्वोपरि सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि RTI किसी विभागीय कृपा का विषय नहीं है।
🔹 State of U.P. v. Raj Narain (1975) SC ने ऐतिहासिक रूप से कहा— “लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार क्या कर रही है।”यह निर्णय आज भी RTI कानून की रीढ़ माना जाता है और पूर्णतः नागरिक-पक्षीय है।
🔹 S.P. Gupta v. Union of India (1981) न्यायालय ने स्पष्ट किया कि open government लोकतंत्र का मूल तत्व है और
गोपनीयता अपवाद है, नियम नहीं।
🔹 Manohar Lal Sharma v. Union of India (RTI से जुड़े अवलोकन) SC ने कहा कि सूचना से इनकार तभी संभव है जब वह कानूनन अपवाद में स्पष्ट रूप से आती हो—अन्यथा सूचना देना बाध्यकारी है।
सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत RTI में देरी या अस्वीकार = नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन Central Information Commission (CIC) : आवेदक को केंद्र में रखकर निर्णय CIC के अधिकांश निर्णायक आदेश यह स्थापित करते हैं कि:_
🔹 Bhagat Singh v. CIC & Ors. (CIC में उद्धृत, बाद में HC द्वारा अनुमोदित सिद्धांत) “सूचना रोकने का भार लोक प्राधिकार पर है, न कि सूचना माँगने वाले नागरिक पर।”
🔹 CIC के निरंतर निर्णय (2023–2025) “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” कहना तब तक स्वीकार्य नहीं जब तक रिकॉर्ड के नष्ट होने/अस्तित्वहीन होने का विधिवत प्रमाण न हो अधूरी या भ्रामक सूचना देना, सूचना न देने के समान है
🔹 CIC का स्थापित सिद्धांत यदि मामला प्रथम व द्वितीय अपील तक पहुँचा—
➡️ यह स्वयं में PIO की विफलता का प्रमाण है
➡️ और दंडात्मक कार्रवाई का आधार बनता है
➡️ CIC का झुकाव स्पष्ट रूप से आवेदक-पक्षीय है, न कि प्रशासन-संरक्षक।
High Court : RTI नागरिक का औज़ार, अधिकारी की ढाल नहीं उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि RTI अधिनियम को कमजोर करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है।
🔹 Delhi High Court – J.P. Agrawal v. Union of India (2011) HC ने कहा—PIO व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी है। यह तर्क स्वीकार्य नहीं कि “विभाग ने सूचना नहीं दी।”यह निर्णय स्पष्ट रूप से RTI आवेदक के अधिकारों की रक्षा करता है।

🔹 Bombay High Court – RTI matters (आवेदक-पक्षीय अवलोकन) अदालत ने माना कि— RTI अधिनियम का पालन न करना
➡️ serious misconduct है
➡️ और नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है।
🔹 Rajasthan High Court के निर्णयों का स्थापित रुझान यदि FAA, PIO की गलती को ढँकने का प्रयास करता है, तो वह भी समान रूप से दोषी माना जाएगा।
अब IPC नहीं, BNS :आवेदक के अधिकार को आपराधिक संरक्षण RTI उल्लंघन अब केवल जुर्माने का विषय नहीं रहा। BNS लागू होने के बाद आवेदक का कानूनी संरक्षण और मजबूत हुआ है।
IPC 166 → BNS धारा 198 लोकसेवक द्वारा जानबूझकर कर्तव्य उल्लंघन कर आवेदक को मानसिक/आर्थिक क्षति पहुँचाना।
IPC 166A → BNS धारा 199 कानूनन आवश्यक कार्य (RTI सूचना देना) न करना।
IPC 175 → BNS धारा 221 सूचना/दस्तावेज जानबूझकर न देना।
IPC 188 → BNS धारा 223 FAA / CIC / SIC के आदेशों की अवहेलना।
निष्कर्ष : अब तराजू एक तरफ़ा नहीं CIC, High Court और Supreme Court—तीनों का संयुक्त संदेश स्पष्ट है:
RTI आवेदक याचक नहीं, अधिकार-धारक है। सूचना रोकना अब प्रशासनिक गलती नहीं,बल्कि संवैधानिक और आपराधिक उल्लंघन है।
Legal Ambit का स्पष्ट मत है कि अब अपीलों में उलझाने की संस्कृति समाप्त होनी चाहिए औरजहाँ आवश्यक हो—सीधी विधिक कार्यवाही की जाए।
✍️ Adv.महावीर पारीक,Legal_Ambit_जागरूकता