Blog

लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायत के लिए शपथ पत्र अनिवार्य-सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत किसी लोक सेवक (public servant) के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत तभी प्रस्तुत की जा सकती है, जब शिकायतकर्ता पहले धारा 175(3) का अनुपालन करे।

अर्थात्, शिकायतकर्ता को यह दिखाना अनिवार्य है कि उसने पहले पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) के समक्ष शपथ-पत्र (affidavit) सहित लिखित शिकायत दी थी।

यह निर्णय जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने दिया। खंडपीठ के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या धारा 175(4) एक स्वतंत्र प्रावधान है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट मौखिक शिकायत पर भी कार्रवाई कर सकता है, या फिर यह धारा 175(3) का ही एक प्रक्रियात्मक विस्तार है, जिसमें Priyanka Srivastava Vs. State of U.P. (2015) में निर्धारित सुरक्षा उपाय लागू होंगे।

धारा 175(3) और 175(4) का संबंध

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 175(4) कोई स्वतंत्र या अलग-थलग प्रावधान नहीं है, बल्कि इसे धारा 175(3) के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि: किसी लोक सेवक के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष सीधे शिकायत दाखिल कर जांच का आदेश नहीं मांगा जा सकता,जब तक कि शिकायतकर्ता यह न दिखाए कि उसने पहले धारा 173(4) BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया था और उसके बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथ-पत्र सहित आवेदन प्रस्तुत किया गया हो। अदालत ने कहा:“पुलिस अधीक्षक के समक्ष उपलब्ध उपाय का सहारा लेना, न्यायिक मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र को सक्रिय करने के लिए एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है।”प्रक्रिया को दरकिनार करने की अनुमति नहीं अदालत ने चेतावनी दी कि यदि धारा 175(4) को एक स्वतंत्र प्रावधान मान लिया जाए, तो इससे शिकायतकर्ता कानून द्वारा स्थापित क्रमबद्ध प्रक्रिया (statutory hierarchy) को दरकिनार कर सकेगा। ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति बिना शपथ-पत्र और बिना पहले पुलिस अधीक्षक से संपर्क किए, सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष लोक सेवक के विरुद्ध शिकायत कर सकेगा, जो कि विधायी मंशा के विपरीत होगा।

अदालत ने कहा कि ऐसा करने से असंगत और अवांछित परिणाम उत्पन्न होंगे, क्योंकि धारा 175(3) स्पष्ट रूप से धारा 173(4) के तहत किए गए प्रयास और शपथ-पत्र की मांग करती है, जबकि धारा 175(4) को अलग-थलग पढ़ने से यह सुरक्षा समाप्त हो जाएगी।

अदालत के निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निष्कर्ष इस प्रकार संक्षेपित किए: धारा 175(3) और 175(4) को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ पढ़ा जाना चाहिए; धारा 175(4), धारा 175(3) का ही विस्तार है। जांच का आदेश देने की शक्ति मुख्य रूप से धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट को प्राप्त होती है। धारा 175(4) भी यह शक्ति देती है, लेकिन लोक सेवकों से जुड़े मामलों में एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित करती है।

धारा 175(4) में प्रयुक्त शब्द “शिकायत (complaint)” का अर्थ मौखिक शिकायत नहीं है। इसे उसी प्रकार के आवेदन के रूप में समझा जाएगा, जैसा धारा 175(3) में है—अर्थात् शपथ-पत्र से समर्थित लिखित आवेदन, जिसमें संज्ञेय अपराध के आरोप हों।

निष्कर्ष

अदालत ने दो टूक कहा कि लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों में वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन अनिवार्य है, और कोई भी शिकायतकर्ता निर्धारित प्रक्रिया को छोड़कर सीधे मजिस्ट्रेट के पास नहीं जा सकता।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

To Top
// Infinite Scroll $('.infinite-content').infinitescroll({ navSelector: ".nav-links", nextSelector: ".nav-links a:first", itemSelector: ".infinite-post", loading: { msgText: "Loading more posts...", finishedMsg: "Sorry, no more posts" }, errorCallback: function(){ $(".inf-more-but").css("display", "none") } }); $(window).unbind('.infscr'); $(".inf-more-but").click(function(){ $('.infinite-content').infinitescroll('retrieve'); return false; }); $(window).load(function(){ if ($('.nav-links a').length) { $('.inf-more-but').css('display','inline-block'); } else { $('.inf-more-but').css('display','none'); } }); $(window).load(function() { // The slider being synced must be initialized first $('.post-gallery-bot').flexslider({ animation: "slide", controlNav: false, animationLoop: true, slideshow: false, itemWidth: 80, itemMargin: 10, asNavFor: '.post-gallery-top' }); $('.post-gallery-top').flexslider({ animation: "fade", controlNav: false, animationLoop: true, slideshow: false, prevText: "<", nextText: ">", sync: ".post-gallery-bot" }); }); });