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RTI कार्यकर्ताओं पर धमकी व उत्पीड़न : अपराध, धाराएँ और न्यायिक संरक्षण

RTI कार्यकर्ता द्वारा सूचना मांगना कोई निजी विवाद नहीं, बल्कि लोकहित में संवैधानिक दायित्व का निर्वहन है। ऐसे कार्यकर्ता को धमकाना, डराना या प्रताड़ित करना केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि RTI Act, संविधान और Rule of Law पर सीधा हमला है।

RTI कार्यकर्ताओं पर धमकी व उत्पीड़न : अपराध, धाराएँ और न्यायिक संरक्षण

👉 FIR दर्ज कराना बाध्यकारी है, विवेकाधीन नहीं। SC का दृष्टांत
“Threatening a citizen for asserting a legal right strikes at the very root of democracy.”
— State of Haryana v. Bhajan Lal, SC

II. प्रशासनिक उत्पीड़न : RTI Act, 2005 का स्पष्ट उल्लंघन
RTI के पश्चात यदि—जानबूझकर सूचना रोकी जाए भ्रामक / अपूर्ण उत्तर दिया जाए

रिकॉर्ड नष्ट या छिपाया जाए तो यह सीधे-सीधे निम्न धाराओं का उल्लंघन है:
🔹 धारा 7 – समयबद्ध सूचना देना अनिवार्य
🔹 धारा 18 – शिकायत का अधिकार
🔹 धारा 19 – प्रथम व द्वितीय अपील
🔹 धारा 20 – PIO पर ₹25,000 तक दंड व अनुशासनात्मक कार्यवाही
CIC का स्पष्ट मत “Denial of information without reasonable cause amounts to obstruction of democracy.”

CIC निर्णय : R.K. Jain v. DDA


III. RTI कार्यकर्ता पर झूठे मुकदमे : कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग

RTI के प्रतिशोध में यदि कार्यकर्ता पर झूठे केस दर्ज जाएँ, तो यह:
🔹 BNS धारा 211 – झूठा अभियोग
🔹 BNS धारा 217 – लोक सेवक द्वारा कानून का उल्लंघन
🔹 BNS धारा 221 – विधिक संरक्षण के बावजूद उत्पीड़न

HC का दृष्टांत
“False prosecution to silence an RTI applicant is abuse of State power.”
— Delhi High Court : Anjali Bhardwaj v. Union of India

👉 ऐसे मामलों में High Court में FIR Quash / Writ Petition पूर्णतः न्यायसंगत है।

IV. पुलिस द्वारा FIR से इंकार : न्यायिक उपचार
यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती

🔹 CrPC (BNSS) के तहत SP को लिखित शिकायत
🔹 न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद

SC का स्पष्ट निर्देश “Registration of FIR is mandatory in cognizable offences.” — Lalita Kumari v. State of UP, SC धमकी व भयादोहन संज्ञेय अपराध हैं।


V. RTI कार्यकर्ता की सुरक्षा : संवैधानिक दृष्टिकोण RTI कार्यकर्ता को संरक्षण प्राप्त है:
🔹 अनुच्छेद 19(1)(a) – अभिव्यक्ति व सूचना का अधिकार
🔹 अनुच्छेद 21 – जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता


SC का ऐतिहासिक निर्णय
“Right to information is intrinsic to the right to freedom of speech.”— PUCL v. Union of India, SC

Legal Ambit का विधिक निष्कर्ष RTI कार्यकर्ता—अपराधी नहीं, संवैधानिक प्रहरी है , बाधा नहीं, जवाबदेही का माध्यम है
👉 उसे धमकाना = कानून का उल्लंघन
👉 उसे डराना = लोकतंत्र पर हमला
डरिए मत – कानून आपके साथ हैं।
CIC, HC और SC आपके साथ हैं।
RTI पूछना अधिकार है, और अधिकार के लिए खड़ा होना ही सच्ची देश सेवा है।

RTI (सूचना का अधिकार) भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो नागरिकों को सरकारी जानकारी मांगने का अधिकार देता है। हालाँकि, RTI कार्यकर्ताओं को अक्सर धमकी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जो उनकी सुरक्षा और अधिकारों के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है। इस लेख में हम RTI कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों, उससे संबंधित अपराधों और धाराओं, और न्यायिक संरक्षण पर चर्चा करेंगे।

RTI कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमले

RTI कार्यकर्ता अक्सर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं, जिससे वे शक्तिशाली लोगों के लिए निशाना बन जाते हैं। धमकी, शारीरिक हमला, और यहां तक कि हत्या तक के मामले सामने आ चुके हैं।

संबंधित अपराध और धाराएँ

RTI कार्यकर्ताओं के खिलाफ होने वाले अपराध में कई धाराएँ शामिल होती हैं:

  1. IPC धारा 302 (हत्या) & BNS 103(1) – अगर किसी RTI कार्यकर्ता की हत्या की जाती है।
  2. IPC धारा 307 (हत्या का प्रयास) & BNS 109 – अगर किसी कार्यकर्ता पर जानलेवा हमला किया जाता है।
  3. IPC धारा 506 (धमकी) & BNS 351 (2)/(3) – अगर किसी कार्यकर्ता को धमकी दी जाती है।
  4. IPC धारा 384 (काला धंधा) & BNS 308 (2) – जब कार्यकर्ता से जबरन पैसे लिए जाते हैं।

न्यायिक संरक्षण

भारतीय अदालतें RTI कार्यकर्ताओं के अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विभिन्न मामलों में, न्यायालयों ने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपाय लागू किए हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि RTI कार्यकर्ताओं को किसी भी प्रकार के उत्पीड़न से बचाने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं।

निष्कर्ष

RTI पूछने का अधिकार केवल एक कानूनी अधिकार नहीं है, बल्कि सच्ची देश सेवा का एक प्रतीक भी है। आतंक और उत्पीड़न का सामना करने वाले RTI कार्यकर्ता, समाज के सच्चे नायक हैं। हमें उनके अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से खड़ा होना चाहिए।

महावीर पारीक
सीईओ & फाउंडर, लीगल अम्बिट

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